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Pak जनरल का खुलासाः 1947 से ही कश्मीर में साजिश कर रही है पाक आर्मी और सरकार, सबूत भी दिए!

पाक सरकार और आर्मी 1947 से ही कश्मीर पर कब्जे की साजिश में शामिल है। पाक आर्मी ने कबालियों के पीछे से किया था बारामूला पर हमला।

राजीव शर्मा अपडेटेड October 17, 2020 23:04 IST
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पाकिस्तानी जनरल और तानाशाह मुशर्रफ के बाद एक और जनरल ने कश्मीर में पाकिस्तानी साजिश को कबूल किया है। इस जनरल से इस साजिश के सुबूत भी दिए हैं। इस जनरल का नाम अकबर खां है। अकबर खां ने कश्मीर पर एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है रैडर्स इन कश्मीर (Raiders in Kashmir)। इस किताब में अकबर खां सिलसिलेबार तरीके से लिखता है कि 1947 में बंटबारे के बाद एक जहां दोनों देशों की सरकारें अपने साधन और संसाधन जुटाने में लगीं थीं वहीं पाकिस्तान के तत्तकालीन प्रधानमंत्री अपनी नजदीकी कोटरी के साथ कबाइलियों की आड़ में कश्मीर पर हमला करने और उस पर कब्जे की साजिश रच रहे थे।

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जनरल अकबर खान की किताब से जाहिर होता है कि यह कश्मीर पर हमला करने की साजिश लाहौर और पिंडी में रची गयी थी। इस किताब के मुताबिक पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी मुस्लिम लीग के बड़े नेता मियां इफ्तिखारुद्दीन ने उससे कश्मीर को छीनने की योजना बनाने को कहा था। मियां इफ्तिखारुद्दीन मोहम्मद अली जिन्ना के सबसे नजदीकी नेता थे। अकबर खान ने बड़ी सफाई से इस बात को कबूला है कि पाकिस्तानी फौज ने कश्मीर पर कब्जा लगभग कर ही लिया था लेकिन भारतीय सैनिकों ने आकर उनकी मंशा पर पानी फेर दिया। अकबर खान ने इस किताब में लिखा है कि 26 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तानी बारामूला पर कब्जा कर चुके थे। यहां 14,000 लोग थे जिनमें से सिर्फ 3,000 लोग ही जिंदा बचे थे। पाकिस्तानी सेना श्रीनगर से मात्र 35 किलोमीटर दूर थी कि महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार को कश्मीर के अधिग्रहण करने का अधिकार पत्र लिख कर दे दिया। इसके बाद भारतीय सेना आ गयी और पाकिस्तान की मंशा धरी की धरी रह गई।

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जनल अकबर खान ने अपनी करतूतों को बड़ी शेखी के साथ बघारा है। उसने लिखा है कि पाकिस्तान ने कश्मीर हथियाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, मगर भारतीय सैनिकों ने वक्त से पहले ही पाकिस्तानी फौज के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

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इस किताब के मुताबिक 1947 में सितंबर की शुरुआत में तत्कालीन मुस्लिम लीग के नेता मियां इफ्तिखारुद्दीन ने उनसे कहा था कि वो भारत से कश्मीर छीनने के लिए योजना बनाए। अकबर खान लिखता है कि मैंने कश्मीर छीनने की योजना बनाई, जिसका नाम ‘कश्मीर में सैन्य विद्रोह’ रखा गया। हमारा मकसद था आंतरिक तौर पर कश्मीरियों को उकसाना, जो भारतीय सेना के खिलाफ विद्रोह कर सकें। साथ ही यह भी कोशिश की गयी कि कश्मीर में भारत की ओर से किसी तरह की कोई सैनिक मदद न मिल सके। अकबर खान ने लिखा, मुझे लाहौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत खान से मिलने को कहा गया। मैं वहां पहुंचा, मगर पहले मैं पंजाब सरकार के ओहदेदारों के साथ बहस-मुहाविसा हुआ। यह बहस-मुहाबिसा को पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री सरदार शौकत हयात खान के दफ्तर में हुआ। मेरी नजर में इस बहस मुहाबिसे का कोई मायना नहीं था लेकि अच्छी बात यह थी कि कश्मीर छीनने की जो योजना मैंने बनाई थी उसकी एक कॉपी किसी के हाथ में थी।

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22 अक्तूबर को पाकिस्तानी सेना ने सीमा पार की और 24 अक्तूबर को मुजफ्फराबाद और डोमेल पर हमला किया, जहां डोगरा सैनिकों को पीछे हटना पड़ा। अगले दिन हम श्रीनगर रोड पर निकले और फिर उरी में डोगराओें को पीछे धकेल दिया। लेकिन देखते क्या हैं कि 27 अक्तूबर को भारत के हवाई जहाज कश्मीर के आसमान में गरज रहे हैं। मतलब यह कि भारत की सेना कश्मीर पहुंच चुकी थी।

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27 अक्तूबर की शाम पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम लियाकत अली खान ने कश्मीर से पाकिस्तानी सेना खदेड़े जाने के बाद पैदा हुए हालात पर लाहौर में बैठक बुलाई। इसमें तत्कालीन रक्षा सचिव और बाद में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल रहे कर्नल इसकंदर मिर्जा, महासचिव चौधरी मोहम्मद अली, फ्रंटियर प्रांत के मुख्यमंत्री अब्दुल कयूम खान, पंजाब के सीएम नवाब मामदोत, ब्रिगेडियर सलार खान और मैं था।

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जनरल अकबर खान ने लिखा है कि उस बैठक में मैंने प्रस्ताव दिया कि कश्मीर में घुसपैठ के लिए पाकिस्तीनी फौजियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। घुसपैठ के लिए सिर्फ कबालियों को वहां भेजा जाए। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ के लिए कबालियों की मदद भी ली गयी लेकिन घटिया हथियारों के सामने घुसपैठिये कबाली और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना भारतीय फौज का सामना नहीं कर सके। उस वक्त पाकिस्तानी सरकार के पास न पैसा था न हथियार फिर भी पाकिस्तानी फौज और कबाली लड़े और कश्मीर के लिए मरे भी।

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अकबर खान ने लिखा है भारतीय फौज लगातार आगे बढ़ रही थी। मुजफ्फराबाद भी हिंदुस्तान के कब्जे में जा ही चुका था। कुछ-एक जगहों पर मोर्चाबंदी और संघर्ष चल रहा था। लेकिन अचानक जवाहरल लाल नेहरू यूनाईटेड नेशंस में चले गये। कश्मीर को छीनने की योजना भले ही फेल हो गयी लेकिन नेहरू के दिमाग में यह बात डालने में कामयाब हो गये कि कश्मीरी की अक्सीरियत (मुसलमानों) पर अक्लियत (हिंदुओं) राज नहीं चल र पाएगा। यूनाईटेड नेशंस के हस्तक्षेप से सीज फायर हो गया और सीजफायर के समय मुजफ्फराबाद पर भारतीय सेना का पूरी तरह कब्जा नहीं था इसलिए वहां पर पाकिस्तानी सरकार और सेना की सरपरस्ती में लड़ रही ताकतों का कब्जा माना गया। चूंकि पुंछ के एक बड़े जमींदार ने आजाद कश्मीर का ऐलान कर दिया था।  इस तरह से पाकिस्तान की सरपरस्ती में आजाद कश्मीर (भारतीयों की नजर में गुलाम कश्मीर) वजूद में आया।

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ध्यान रहे, इसके बाद पाकिस्तान से एक और जंग हुई है। उसमें भी पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। लगातार मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान ने सीधे जंग के बजाए भारत के खिलाफ छद्म युद्ध की रणनीति को अपना लिया है। जनरल अकबर खान के सुझाव के ही मुताबिक कश्मीर में पाकिस्तानी फौजी आतंकियों की शक्ल में घुसपैठ करते रहे। फिर इन आतंकियों ने कश्मीर की नई नस्ल को आतंक की आग झोंकना शुरू कर दिया।
भारत से छद्मयुद्ध की रणनीति को कारगिल वॉर के क्रिएटर परवेज मुशर्रफ ने बड़ी बेशर्मी इस बात को कबूल भी किया है। मुशर्रफ पाकिस्तानी चैनल एआरवाई से ने कहा था कि ‘वो लश्कर-ए-तैय्यबा औ हाफिज सईद के सबसे बड़े समर्थक हैं।’ मुशर्रफ ने कश्मीर में भारतीय सेना को दबाव बनाए रखने के लिए इस आतंकी गिरोह तारीफ भी की थी। उन्होंने कबूला कि लश्कर भारतीय कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में शामिल है। मुशर्रफ ने एआरवाई से यह ही कबूला था कि मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद कश्मीर की गतिविधियों में शामिल रहता है।

मुशर्फ की तरह ही इमरान खान की पार्टी की नेता नेता शरीन मजारी की बेटी ‘ईमान’ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। जिसमें वो आतंकियों को पाकिस्तानी सेना के समर्थन और संरक्षण की बात कबूल कर रहीं थीं।

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