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धर्म के नाम पर गला फाड़ने वालों के मुंह पर दयानंद के परिवार का करारा तमाचा, 20 सालों से कर रहा इफ्तार का इंतजाम

धर्म के नाम पर गला फाड़ने वालों के मुंह पर दयानंद के परिवार का करारा तमाचा

भारत की सभ्याता सबसे पुरानी सभ्यता मानी गई है। यहां पर हर जाती और धर्म के लोगों की बड़े भी भावपूर्ण इज्जत की जाती है। यहां हिंदू के साथ मुसलमान भी रहते हैं और सिख भी रहते हैं। ईसाई भी हैं तो कई अन्य जाती के लोग भी हैं। जब भी को पर्व या त्योहार पड़ता है तो ये सब मिलकर मनाते हैं। कभी हिंदू ईद की मुबारक बाद देने अपने मुस्लिम पड़ोसी या दोस्त के घर जाता है तो कभी मुस्लिम परिवार होली के त्योहार में शामिल हो कर खुशियां बांटता है। वो बात अलग है कि कुछ असमाजिक तत्वों द्वारा इसमें दखल डाल दिया जाता है। कुछ कट्टरपंथी अपनी राजनीति करने के लिए जाती और धर्म को आगे ले आते हैं। ऐसे लोगों के लिए दयानंद का परिवार अनुठा बनकर आया है जो पिछले 20 सालों से इफ्तार कर रहा है। हैदराबाद के कारवान असेंबली इलाके के दयानंद का परिवार पिछले 20 सालों से रमजान के पाक महीने में इफ्तार का आयोजन कर रहा है।

ये वो दयानंद का परिवार है जिसे किसी प्रचार की जरूरत नहीं है। वो औरों की तरह गला फाड़ कर ये नहीं कहते कि हमने मुसलमानों के लिए क्या किया। वो ये नहीं कहते कि हम सालों से इफ्तार का इंतजाम कर रहे हैं। बल्कि को चुपचाम अपना काम कर रहे हैं। हालांकि, ऐसे लोगों को समाज के सामने लाने की बहुत ज्यादे जरूरत है। ताकि लोगों को इनसे सीख मिल सके कि जाती-धर्म से परे हटकर इंसानीयत मायने रखती है।

20 सालों से हिंदू परिवरा कर रहा है इफ्तार का इंतजाम

दो साल पहले दयानंद के देहांत के बाद इस काम को उनकी पत्नी कस्तूरी देवी और लड़के संकोरी दीपक और संकोरी शिवा कुमार अपने पिता की वसीयत के अनुसार हर साल पाबंदी के साथ मस्जिदों में इफ्तारी का आयोजन करते हैं। बीते दिनों दिवंगत दयानंद के घर के सभी लोग (पुरुष और महिलाएं) शहर के मेहंदी पटनम इलाके के कारवान में मौजूद मस्जिद ए मोहम्मदी पहुंचा और लोगों के साथ इफ्तार किया। मौके पर मस्जिद के अध्यक्ष उसमान बिन मोहम्मद अल हाजरी, मौलाना शफीक आलम खान जामयी, शहरी अध्यक्ष, जमीयत ए अहले हदीस और लोगों ने पगड़ी बांध कर उनका स्वागत किया।

पिता के देहांत के बाद पत्नी और बच्चों ने संभाली यह परंपरा

अपने एक बयान में दयानंद के लड़के संकोरी शिवा कुमार ने कहा कि, ये परंपरा मेरे दादा शंकर कृष्णा के वक्त से चली आ रही है। वह अपने समय मे मस्जिदों में हर साल इफ्तारी की व्यस्था करते थे, समाज के सभी वर्गों के लोगों में बगैर किसी भेदभाव के समाजिक उत्थान के लिए काम करते थे, उनके देहांत के बाद पिता जी इस नेक काम को कर रहे थे, अब पिता जी के दुनिया से चले जाने के बाद हमलोग इस काम को कर रहे हैं। देश के अंदर हालात कैसे भी बन जाए ये हमारा ख्वाब है जिसे हम पूरा करते रहेंगे।

ये हमारे देश की साझी संस्कृति है जो सदियों से चला आ रहा हैं

इसके आगे उन्होंने कहा कि, देश के अंदर हिंदू मुसलमान कैसे अलग हो सकते हैं? हम एकदूसरे की खुशी और गम में शिरकत करते हैं। लोगों कुछ भी कहे लेकिन भाईचारे को खत्म नहीं किया जा सकता है। शिवा बताते हैं कि अगर हमारे अच्छे संस्कार आने वाली नस्लों को मिलेगा तो वह भी इस पुण्य काम के लिए सिलसिला को जारी रखेंगे। वहीं, जमीयत-ए-अहले हदीस के शहरी अध्यक्ष मौलाना उसमान बिन मोहम्मद अल हाजरी ने कहा कि, ये हमारे देश की साझी संस्कृति है जो सदियों से चला आ रहा हैं। हमारे समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं हैं जो सामाजिक सौहार्द के लिए काम कर रहा हैं और करना चाहते हैं लेकिन हमारा मुस्लिम समाज इससे दूर है या यू कहें कि जुड़ना नहीं चाहते हैं।

कई सारे हिंदू हैं जो इफ्तार के लिए मस्जिद में सामान भेजते हैं

उन्होंने कहा कि, देश के अंदर जो हालात है ऐसे में ऐसे लोगों की सख्त जरूरत है। इसके साथ ही अब्दुल कादिर का कहना है कि, पुराने शहर में इफ्तार के समय बहुत सारे हिन्दू भाई ऐसे है जो इफ्तार के लिए मस्जिद सामान भेजते हैं किसी को बताते नहीं है। वह सामने नहीं आना चाहते हैं। मस्जिद से बहुत लगाव रखते हैं। समाज में ऐसे लोग है जो अमन और भाईचारे पर विश्वास रखते हैं।