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Shani Pradosh Vrat 2022: शनि प्रदोष व्रत पर इस विधि से करें भगवान शिव और शनि की पूजा, पुत्र प्राप्ति के लिए सुनें ये कथा

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आज शनि प्रदोष व्रत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत करने से पुत्र की प्राप्ति होती है। अगर आप शनि प्रदोष व्रत करना चाहते हैं, तो इसके लिए पहले से तैयारी कर लें। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन में खुशहाली आती है। शनि प्रदोष व्रत रखने वाले भक्तों को भगवान शंकर के साथ शनिदेव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। कहा जाता है कि शनि त्रयोदशी शनि देव की जन्म तिथि है। इसलिए इस दिन शनि प्रदोष व्रत रखना और ज्यादा फलदायी हो जाता है।

पुराणों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत करने से संतान सुख प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है। इस दिन शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनि के कुछ उपाय भी किये जाते हैं। जैसे शनि मंदिर में तेल चढ़ानेऔर दीपक जलाने से भक्तों की कई मनोकामनाओं को पूर्ति होती है। चलिए आपको बताते है कि प्रदोष व्रत की पूजा की विधि, मुहूर्त और कथा-

 

प्रदोष व्रत 2022 पूजा मुहूर्त

शिव पूजा के लिए प्रदोष मुहूर्त आज शाम 05:46 बजे से लेकर रात 08:28 बजे तक है। इस समय में ही शिव पूजा करें।

 

प्रदोष व्रत पूजन विधि

पुराणों के अनुसार प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव का माता पार्वती के साथ पूजन करने का विधान है। यदि आप प्रदोष व्रत करते हैं तो इस दिन प्रातः जल्दी उठाकर स्नान ध्यान से मुक्त होकर सभी भगवानों को स्नान कराएं। नए वस्त्रों से सुसज्जित करके भगवान शिव का पूजन माता पार्वती समेत करें। पूरे दिन फलाहार का पालन करते हुए व्रत करें और प्रदोष काल में फिर से शिव पूजन करें। पूजन के लिए  एक चौकी पर साफ़ वस्त्र बिछाएं और शिव परिवार की मूर्ति या शिवलिंग रखें। भगवान शिव और माता पार्वती को जलाभिषेक कराएं या शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।

शिव लिंग पर चंदन से तिलक लगाएं और माता पार्वती को सिंदूर अर्पित करें। प्रदोष काल में पूजन के दौरान प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें। शिव जी की आरती करें और भोग अर्पित करें। भोग में मुख्य रूप से खीर अर्पित करना भगवान शिव को प्रसन्न करना है। 

 

शनि प्रदोष व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीनकाल में एक नगर में एक सेठ रहते थे। उनके घर में सभी सुख सुविधाएं थीं लेकिन कोई संतान नहीं थी। जिसकी वजह से सेठ और उनकी पत्नी हमेशा दुखी रहते थे। बहुत सोचने विचारने के बाद सेठ जी ने अपना सारा कारोबार अपने सेवकों को सौंपा और पत्नी समेत तीर्थ यात्रा पर निकल गए। नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए। सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए और जब साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने द्प्नों को आशीर्वाद देते हुए शनि प्रदोष व्रत की सलाह दी जिससे उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हो सके। दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े और तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया जिसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। तभी से शनि प्रदोष का व्रत अत्यंत फलदायी माना जाने लगा।