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1962 में China से क्यों हारे, 1971 में Pakistan को हराने के बाद भी कांग्रेस सरकारें POK वापस क्यों नहीं छीन पाईं, मोदी सरकार रखेगी देश के समाने

1962 में चीन से क्यों हारे, सच आएगा सामने

'मोदी सरकार ने 1993 के एक्ट के हवाला देते हुए अब चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों की जानकारी सार्वजनिक करने का फैसला किया है। अब सारी जानकारियां इतिहास की शक्ल में देश के सामने आंएगी। ये ऐसा इतिहास होगा जिससे कांग्रेस सरकार की खामियों, अक्सानी चिन पर चीन के कब्जे और पीओके को वापस न ले पााने के कारण भी दस्तावेज में दर्ज किए जाएंगे।'

मोदी सरकार के एक और फैसले से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ने वाली है। मोदी सरकार का यह फैसला पहले की कांग्रेस सरकार की खामियों और गलत नीतियों को उजागर करेगा। हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर मोदी सरकार ने कांग्रेस के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया लेकिन परोक्ष रूप से कांग्रेस की छवि को नुकसान हो सकता है। खासतौर से जवाहर लाल नेहरू के समय चीन युद्ध के दौरान गलत फैसलों की जानकारी अब प्रमाण सहित देश के सामने आने वाली है।

दरअसल, पब्लिक रिकॉर्ड एक्ट 1993 और पब्लिक रिकॉर्ड रूल्स 1997 के का हवाला देकर मोदी सरकार ने चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों की सभी जानकारी सार्वजनिक करने के आदेश दे दिए हैं। चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के दौरान सरकार और सेना के बीच हुए खतो-किताबत और सूचना-संवादों के आदान-प्रदान को भी सार्वजनिक किया जाएगा।

पाकिस्तान के साथ युद्धो की मोटी-मोटी जानकारी सभी को है लेकिन चीन ने भारत पर हमला क्यों किया और भारत उसको माकूल जवाब क्यों नहीं दे पाया। चीन युद्ध के दौरान भारत ने वायुसेना का उपयोग क्यों नहीं किया। जैसे तमाम सवाल कांग्रेस के सामने उठ सकते हैं। इन सवालों का जवाब शायद ही कांग्रेस के मौजूदा नेताओं के पास हों। ऐसा कहा जाता है कि उस वक्त चीन की वायुसेना भारत के मुकाबले कुछ भी नहीं थी। अगर भारत ने वायुसेना का इस्तेमाल युद्ध में किया होता तो चीन भारत के 44 हजार वर्ग किलोमीटर के  अक्साई चिन पर कब्जा नहीं कर पाता। यह भी संभव है कि तिब्बत आजाद हो जाता और एलएसी पर चीन और भारत के बीच न होकर तिब्बत के साथ होती। युद्ध में चीन को सरैंडर करना पड़ सकता था।  बार-बार डोकलाम जैसी घटना दोहराने और अरुणाच को अपना कथित हिस्सा बताने की हिमाकत भी चीन कभी नहीं कर पाता।

बहरहाल, मोदी सरकार ने जिस नीति का पालन किया है उसके अनुसाररक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले सभी प्रतिष्ठान मसलन सेना की तीनों शाखाएं (थल-जल-वायु), इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ, असम राइफल्स और भारतीय तटरक्षक वॉर डायरीज (युद्ध के दौरान घटित घटनाओं का विस्तृत ब्योरा), लेटर्स ऑफ प्रोसिडिंग्स (विभिन्न प्रतिष्ठानों के बीच अभियान-युद्ध संबंधी आपसी संवाद) और ऑपरेशनल रिकॉर्ड बुक (अभियान की पूरी जानकारी) सहित सभी सूचनाएं रक्षा मंत्रालय के इतिहास विभाग को मुहैया कराएंगे जो इन्हें सुरक्षित रखेगा, उनका संग्रह करेगा और इतिहास लिखेगा।

रक्षा मंत्रालय के बयान के अनुसार, ‘‘पब्लिक रिकॉर्ड एक्ट 1993और पब्लिक रिकॉर्ड रूल्स 1997के अनुसार रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने की जिम्मेदारी संबंधित प्रतिष्ठान की है।’’

नीति के अनुसार, सामान्य तौर पर रिकॉर्ड को 25साल के बाद सार्वजनिक किया जाना चाहिए। बयान के मुताबिक, ‘‘युद्ध/अभियान इतिहास के संग्रह के बाद 25साल या उससे पुराने रिकॉर्ड की संग्रह विशेषज्ञों द्वारा जांच कराए जाने के बाद उसे राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंप दिया जाना चाहिए।’’

बयान में कहा गया है कि युद्ध और अभियान के इतिहास के प्रकाशन के लिए विभिन्न विभागों से उसके संग्रह और मंजूरी के लिए इतिहास विभाग जिम्मेदार होगा।रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव के नेतृत्व में एक  समिति का गठन किया जाएगा। जिसमें थलसेना-नौसेना-वायु सेना के प्रतिनिधियों, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और अन्य प्रतिष्ठानों और (आवश्यकतानुसार) प्रतिष्ठित इतिहासकारों को समिति में शामिल किया जाएगा।