Bangladesh में रेडिकल मुसलमानों की हिंसा के शिकार अल्प संख्यक हिंदू-बौद्ध समुदाय

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बांग्लादेश में कट्टरपंथियों की हिंसा के शिकार- हिंदू और बौद्ध

बांग्लादेश में हिंदू या बौद्धों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में कोई कमी नहीं आई है। बांग्लादेश के हिंदू और बौद्ध जैसे छोटे समुदाय आक्रामक, असहिष्णु बहुसंख्यकों अत्याचारों के कारण घटते जा रहे हैं। बांग्लादेश के कट्टरपंथी बहुसंख्यक मुसलमा इन हिंदू और बौद्ध अल्पसंखयों के धार्मिक स्थलों को निशाना बना रहे हैं। हिंदुओं के घरों और पूजा स्थलों को नष्ट-भ्रष्ट करना कट्टरपंथी मुसलमानों की सामान्य गतिविधियां है।

हाल ही में 7 अगस्त को खुलना जिले के रूपसा उपजिले के शियाली गांव में सैकड़ों आतताईयों ने हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ा और घर-दूकान-मकानों को आग लगा दी। हालांकि इस घटना की इत्तला के बाद पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन तब तक सब कुछ लुट चुका था। बांग्लादेश के हिंदु नेताओं की समझ में नहीं आ रहा कि पुलिस और खुफिया विभाग ऐसी शर्मनाक घटनाओं को रोकने में नाकाम क्यों है।

ऐसा बताया जाता है कि 6 अगस्त की शाम को गांव की कुछ महिलाएं भजन-कीर्तन करती हुई श्मशान घाट की ओर जा रही थीं, तभी रास्ते में एक मस्जिद के इमाम उस पर ऐतराज उठा दिया। यहीं से तनाव और विवाद पैदा हुआ। पुलिस ने इस मामले को हलके ढंग से लिया। पुलिस के लचर रवैये ने कट्टरपंथी-सांप्रदायिक तत्वों को मौका दे दिया। नतीजतन हिंदुओं के संपत्तियों पर हमले होने लगे। घरों-दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। मंदिरों को तोड़ा गया और मूर्तियों का अनादर किया गया।हालांकि पुलिस कहती है कि अब स्थिति नियंत्रण में है। लेकिन इलाके की हिंदू आबादी भय और असुरक्षा के वातावरण में जी रही है। जानकार सूत्रों का कहना है कि इस घटना केवल हिंदुओं पर सांप्रदायिक हमला ही नहीं बल्कि जिले के परस्पर धार्मिक सौहार्द्र पर हमला है। दंगाईयों की पहचान नहीं की जा सकी है लेकिन स्पष्ट है कि ये घृणाभरी हिंसा के पीछे इस्लामिक कट्टपंथी ही हैं।

दरअसल, बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घृणा और हिंसक वारदातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ढाका यात्रा के बाद से एकदम उभार पर आ गई हैं। उनकी ढाका यात्रा दौरान ही ब्राह्मणबाड़ी में हिंदुओं के घर और प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया गया था। दंगाईयों के सामने कानून व्यवस्था कुछ भी शेष नहीं थी। कट्टरपंथियों ने देश के संविधान और कानून व्यवस्था को धता बताते हुए अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उस्ताद अलाउद्दीन खान के जन्म स्थान और म्यूजिक एकेडमी को भी अपनी असहिष्णुता का निशाना बना डाला।

सत्ताधारी दल ने इस घटना की निंदा तो की लेकिन बहुत देर से। इस घटना के बारे में बांग्लादेश के प्रशासनिक अमले का कहना है कि ये सब अति रूढिवादी गिरोह हिफाजत-ए-इस्लाम का करा-धरा है। इस संगठन को वजूद में आए लगभग 11 साल हो चुके हैं। हिफाजत-ए-इस्लाम बांग्लादेश में मुगलकालीन शरिया कानून लागू करने और मूर्तियों को तोड़े जाने का अभियान चला कर कुख्यात हुआ है। इस गिरोह के लोग तमाम अवांछनीय गतिविधियों में लिप्त हैं। इसी गिरोह ने बांग्लादेश के जनक बंग बंधु शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति को तोड़ दिया था। ये बहुत ही दुख की बात है कि हिंसा की ये वारदातें तब हुई जब भारतीय प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान की जन्म शताब्दि समारोह और भारत-बांग्लादेश की मित्रता की 50वीं वर्षगांठ समारोह से लौटे थे। बांग्लादेश की आजादी में भारत का अनोखा योगदान इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

बांग्लादेश में हिंदुओं की तरह बौद्धों को भी सांप्रदायिकता की आग में झुलसना पड़ रहा  है। इसी साल 26 जुलाई को रनगुनिया सब डिस्ट्रिक्ट के फलाहरिया गांव में 17 फुट ऊंची बौद्ध प्रतिमा को खण्डित कर दिया गया। बौद्ध विहार को नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया। इस घटना से बांग्लादेश के बौद्धों की धार्मिक आस्था जख्मी हुई बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि बुद्ध प्रतिमा तोड़ने वालों के मन में कितनी घृणा भरी हुई है। महात्मा बुद्ध की दुनिया भर में पूजा की जाती है। बौद्धों की ओर बांग्लादेश में कभी भी सांप्रदायिकता की समस्या पैदा नहीं की। बौद्धिस्टों के इस गांव में बौद्ध विहार का निर्माण 2012 में किया गया था। स्थानीय कट्टपंथियों ने बौद्ध चिह्नों, पताकाओं, पोस्टर-प्रतीकों के लगाने का लगातार विरोध किया है। ये कट्टरपंथी कहते हैं कि मुसलमान किसी अन्य धर्म के प्रतीकों के नीचे नहीं चलेगें।

बौद्ध नेतृत्व का दावा है कि उन्होंने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का ध्यान कई बार आकर्षित कराया है। उनसे हस्तक्षेप करने और 2020 से बनी तनाव की स्थिति को समाप्त करने का आग्रह किया है। लेकिन स्थिति जस की तस ही नहीं हुई है बल्कि बौद् धर्मावलंबियों और उनके पूजा प्रतिष्ठानों पर हमले लगातार जारी है। बांग्लादेश में अच्छा खासा प्रभाव रखने वाले बौद्ध नेता का कहना है कि इन हमलों के पीछे हिफाजत-ए-इस्लाम के समर्थकों का ही हाथ है। जब तक सत्ताधारी दल, कानून नाफिज करने वाली एजेसी, खुफिया एजेंसियों के आला अधिकारी जब तक आगे बढ़ कर कोई प्रयास नहीं करेंगे तब तक हिंदुओं और बौद्धों पर होने वाले हमलों को नहीं रोका जा सकता।

सुझाव यह भी है कि हिंदु और बौद्ध एक जुट होकर सत्ताधारी अवामी लीग पार्टी के समर्थन में बड़ा वोट बैंक खड़ा करें, और सत्ताधारी दल यानी बांग्लादेश की सरकार प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और भविष्य की सोच रखने वाले एनजीओ तथा व्यक्तियों को अल्प संख्यक समुदायों के बीच सक्रिए करें। जिससे दोनों ओर से भरोसा पैदा हो सके।

आखिरकार बांग्लादेश में भी अमन-चैन चाहने वालों की कमी नहीं है। खुलना में हिंदुओं पर हमले और फलाहरिया में बौद्ध प्रतिमा को खण्डित किए जाने की घटना पर मरहम लगाने की जरूरत है इसे नासूर बनने के लिए यूं ही नहीं छोड़ना चाहिए।

(लेखकः मारीशस के प्रधानमंत्री के पूर्व नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर और रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं)