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कश्मीर से 370 हटाने के बाद कैसे हैं घाटी के जमीनी हालात! 2 साल बाद सियासी फसानों और हकीकत के अफसानों पर Exclusive Report

दो साल में कितने बदले कश्मीर के हालात!

कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म हुए दो साल बीत गए हैं। दरिया-ए-झेलम में बहुत पानी बह गया है। कश्मीर अब कश्मीर है। लोग खुली हवा में सांस ले रहे हैं। डेवलपमेट की वो इबारतें जो कागजों पर उकेरी मगर फाइलों में धूल फांक रही थीं वो हकीकत में जमीन पर उतर आई हैं। स्कूल-कॉलेज, हेल्थ सेंटर-हॉस्पीटल और आम जीवन को प्रभावित करने वाली सुविधाएं लोग हासिल कर रहे हैं। कश्मीर के युवा गली के नुक्कड़ या चौराहों पर नहीं बल्कि भर्ती सेंटरों पर दिखाई दे रहे हैं। मतलब ये कि रोजगार भी नियमित मिल रहा है या मिलने के अवसर बन रहे हैं। खेतों में जाफरान, बागीचों में सेव और डल झील में सैलानियों की बहार है।

लद्दाख के लोग तो घाटी के लोगों से भी ज्यादा खुश हैं। सेंट्रल यूनिवर्सिटीज के अलावा वहां भी डेवलेपमेंट के तमाम काम शुरू हो चुके हैं। दरअसल 370 हटने के बाद लद्दाख को अपनी पहचान मिली है। आजादी के बाद से लद्दाख सिर्फ एक जगह थी। फिल्हाल भले ही केंद्र के अधीन है लेकिन लद्दाख अब एक राज्य है। लद्दाख की अपनी नीति है। अपने नियामक हैं। भौगोलिक परिस्थितियों और आवश्यकता के अनुरूप लद्दाख के लोगों को विकास और रोजगार के साधन-अवसर बनाए गए हैं या बनाए जा रहे हैं।

देश के सीनयर जर्नलिस्ट और कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ आरसी गंजू 5 अगस्त 2019 के बाद से कश्मीर के हालातों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। उनका मानना है, हालात पहले बहुत बदले हैं। लोगों के भरोसे और विश्वास में गजब का इजाफा हुआ है। अनुच्छेद 370 खत्म करने के तुरंत बाद नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोभाल ने कश्मीर का दौरा किया। वहां के लोगों से मुलाकात की। कश्मीरियों के मन में जो आशंका और भय था वो इस मुलाकात से कम हुआ था। अजीत डोभाल की कश्मीरियों से वैसी ही मुलाकात और हो जाए तो कश्मीरियों को 'बूस्टर' मिल सकता है।

आरसी गंजू ने इस बीच देश के विभिन्न राजनेता-मीडिया पर्सन और समाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की है। विभिन्न वर्गों की राय के बाद उनका विश्लेषण यह है कि अधिकांश लोग चाहते हैं कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी से पहले कश्मीर के विकास को स्थायित्व मिलना चाहिए। कुछ वर्ग के लोगों का मानना है कि भारतीय कश्मीर में सुरक्षा और मजबूत होनी चाहिए। अगर तालिबान अफगानिस्तान पर पूरा कब्जा कर लेता है तो तालिबान के आतंकी वहां से बाहर निकलेंगे। पाकिस्तान भाड़े पर पल इन आतंकियों को कश्मीर के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है। ऐसी भी आशंका है कि गिलगित बालटिस्तान से तालिबान के आतंकी मुफ्फराबाद होते हुए श्रीनगर का रुख कर सकते हैं। तालिबान ने काराकोरम दर्रा के पास अपनी मौजूदगी का अहसास कुछ दिन पहले ही करवाया है।

आरसी गंजू कहते हैं कि यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि जम्मू-कश्मीर से जम्मू को भी लद्दाख की तरह अलग करने की आवाजें भी उठने लगी हैं। ऐसा कहा जाता है कि सत्ता पक्ष एक वर्ग इस आवाज को भीतर ही भीतर बल दे रहा है। हालांकि, जम्मू को कश्मीर से अलग करने की मांग जाने- अनजाने डिक्सन प्लान को अपनाने जैसा हो सकता है। ऐसी भी जानकारियां हैं कि केवल आरएसएस या बीजेपी के लोग ही नहीं बल्कि कश्मीर के गैर बीजेपी सियासी दल भी निक्सन प्लान को लागू किए जाने की दिशा में काम कर रहे हैं। हालांकि खुलकर इन सियासी दलों ने भी डिक्सन प्लान का जिक्र नहीं किया है। 

कश्मीर पर खुलकर विचार रखने वाले कहते हैं कि डिक्सन प्लान अव्यवहारिक हो चुका है। कश्मीर के लोगों की आस्था-विश्वास और भरोसा भारत के साथ है। भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली और न्याय व्यवस्था में है। डीडीसी के चुनाव से सटीक उदाहरण है। मतलब यह कि सियासी लोग और सियासी जमातें अपने स्वार्थ भले ही देख रही हों मगर आम कश्मीरी न तो किसी डिक्सन प्लान को जानता है और न उसकी ऐसी कोई मंशा है। अब हकीकत यह है कि गिलगित बालटिस्तान और गुलाम पाकिस्तान या जिसे पीओके कहते हैं- के लोग 5 अगस्त 2019 के बाद कश्मीर में हो रहे बदलाव से आश्चर्य चकित हैं। मीरपुर-मुजफ्फराबाद, कोटली जैसे तमाम शहरों में पाकिस्तान के खिलाफ उठने वाली आवाजें मजबूत हुई हैं। पाकिस्तान की गुलामी से निजात हासिल करने वालों का हौंसला बढ़ा है।

अभी हाल में गुलाम कश्मीर के फर्जी और असंवैधानिक चुनाव के दौरान कई उम्मीदवारों ने खुलकर हिंदुस्तान में शामिल होने के बयान दिए हैं। बहरहाल, जब डिक्सन प्लान की बात चली है तो यहां यह समझने की आवश्यकता कि आखिर ये डिक्सन प्लान है क्या?

कवाइलियों के भेष में पाकिस्तानी फौज का कश्मीर पर हमला  हुआ। भारत  ने आक्रमणकारियों और आतताईयों  को खदेड़ दिया। भारत और पाक के बीच भीषण संघर्ष हुआ। मुजफ्फराबाद को लगभग जीतने के कगार पर खड़ी भारतीय फौजों को अचानक जंग रोकने का आदेश दे दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपनी तयीं संयुक्त राष्ट चले गए। कुछ भाड़े के टट्ओं को पाकिस्तान की गुलामी तले मीरपुर, मुजफ्फराबाद को आजाद कश्मीर कहने का मौका मिल गया। पाकिस्तान ने अपनी फौजों का रिइनफोर्समेंट कर दिया।

अगस्त 14 मार्च 1950 को संयुक्त राष्ट्र ने जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की संभावना को खोजने के लिए सर ओवेन डिक्सन को भेजा। उनका मकसद दोनों ओर के इलाकों को डिमिलिट्र्राइज्ड कराने के बाद जनमत करवाना था। उस समय के हालातों को देखते हुए सर ओवेन डिक्सन की बुद्धि ने जो सुझाव दिए वो 'जानो-और मानो' यानी अर्थमैटिक के बजाए अलजेब्रा पर आधारित था। आज के विचारकों का कहना है कि चंद दिनों लिए कश्मीर आए सर ओवन डिक्सन कश्मीर को समझने में नाकाम रहे। डिक्सन की रिपोर्ट का निष्कर्ष यह था कि लद्दाख और जम्मू भारत के साथ रहे और कश्मीर पाकिस्तान को दे दिया जाए।

निक्सन को शायद मालूम नहीं था या उनका ध्यान 1947 से पहले हुए उस जनमत नहीं गया जिसे जिन्ना की जिद पर करावाया गया था। इस जनमत में 95 फीसदी ने मुसलमानों ने अलग पाकिस्तान बनाने के पक्ष में मत दिया, लेकिन जब वास्तविक बंटबारा हुआ तो आधे से ज्यादा मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने से साफ इंकार कर दिया। वो पाकिस्तान नहीं गए। उन्होंने हिंदुस्तान को ही अपनी जननी माना। हिंदुस्तान के साथ ही अपने मुस्तकबिल को चुना। इसीलिए कश्मीर पर सर ओवेन डिक्सन की अव्यवहारिक थ्योरी कागजों के ढेर में कहीं खो गई।

पांच अगस्त 2019 के बाद कश्मीर के लिए बहुत कुछ हुआ है लेकिन बहुत होना अभी बाकी है।

गिलगिट वाल्टिस्तान और गुलाम कश्मीर की आजादी के लिए अलख जगाने वालों में से एक डॉक्टर अमजद अय्यूब मिर्जा और दुनिया भर में कश्मीर का जाना-पहचाना चेहरा याना मीर पिछले दो सालों मे कश्मीर में आए बदलाव को किस तरह बयान करते हैं-यह उनकी जुबान में जानने के लिए देखते हैं ये वीडियो-

गुलाम कश्मीर और पाकिस्तान के लोगों तक यह वीडियो पहुंच चुका है। इसके बावजूद पाकिस्तान की इमरान सरकार दुनियाभर के सामने ड्रामा करने जा रहा है। पाकिस्तान की इमरान सरकार खुद भी जानती है कि गुलाम कश्मीर के कुछ लोगों को छोड़कर अधिकांश लोग भारत के पक्ष में हैं। फिर भी वो अपना राग अलापने से बाज नहीं आ रही है। पाकिस्तान की लगातार कोशिश है कश्मीर में दहशतगर्दी बनी रही। इसके अब उसने ड्रोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। उधर के कश्मीर के लोग कह रहे हैं कि हमें भारत के कश्मीर की तरह पानी चाहिए, बिजली चाहिए, स्कूल चाहिए, सड़कें चाहिए और रोजगार चाहिए, हमें भारत चाहिए। यही वो डर है पाकिस्तान सरकार और सियासी दलों का जो अब मीरपुर, मुजफ्फरपुर, कोटली जैसे शहरों में बाहर निकल कर आ रहा है।